सीमापार ई-अपशिष्ट व्यापार के लिए सशक्त नियमन की आवश्यकता

पाठ्यक्रम: GS3/ पर्यावरण

संदर्भ

  • थाईलैंड ने 284 टन अमेरिकी मूल के आयातित ई-अपशिष्ट को अधिगृहीत किया, जिसे भ्रामक रूप से स्क्रैप धातु के रूप में चिह्नित किया गया था। यह प्रकरण सीमापार खतरनाक अपशिष्ट के परिवहन तथा तथाकथित “प्रदूषण के निर्यात” से संबंधित गंभीर चिंताओं को रेखांकित करता है।

ई-अपशिष्ट क्या है?

  • ई-अपशिष्ट उन विद्युत एवं इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को कहा जाता है जिन्हें त्याग दिया गया है, जैसे कंप्यूटर, सर्किट बोर्ड, मोबाइल फोन और घरेलू उपकरण।
  • इसमें सीसा, पारा, कैडमियम और ब्रोमिनेटेड फ्लेम रिटार्डेंट जैसे खतरनाक पदार्थ होते हैं।
  • अनुचित निपटान से मृदा प्रदूषण, जल प्रदूषण और स्वास्थ्य संबंधी खतरे उत्पन्न होते हैं।

विकसित देश ई-अपशिष्ट क्यों निर्यात करते हैं?

  • विकसित देशों में ई-अपशिष्ट का पुनर्चक्रण तकनीकी रूप से जटिल और महंगा होता है।
  • विकासशील देशों में पर्यावरणीय नियम अपेक्षाकृत कमजोर होते हैं और श्रम सस्ता होता है, जिससे अनौपचारिक पुनर्चक्रण आसान हो जाता है।
  • इससे “अपशिष्ट उपनिवेशवाद” (Waste Colonialism) की स्थिति उत्पन्न होती है, जिसमें प्रदूषण गरीब देशों की ओर स्थानांतरित कर दिया जाता है।

भारत में ई-अपशिष्ट की स्थिति

  • भारत, चीन और अमेरिका के बाद विश्व का तीसरा सबसे बड़ा ई-अपशिष्ट उत्पादक है।
  • ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर के अनुसार भारत में ई-अपशिष्ट का उत्पादन 2020 में लगभग 2.76 MMT से बढ़कर 2024 में 6.19 MMT हो गया है और 2030 तक इसके 14 MMT तक पहुँचने का अनुमान है।
  • ई-अपशिष्ट में सबसे बड़ा हिस्सा कंप्यूटर उपकरणों का है (65%), इसके बाद बड़े उपकरण एवं चिकित्सा उपकरण (15%), दूरसंचार उपकरण (12%) और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स (8%) आते हैं।

ई-अपशिष्ट प्रबंधन की चुनौतियाँ

  • तीव्रता से वृद्धि: तकनीकी प्रगति और उत्पादों के छोटे जीवन-चक्र के कारण ई-अपशिष्ट का उत्पादन लगातार बढ़ रहा है।
  • अनौपचारिक क्षेत्र का प्रभुत्व: भारत जैसे देशों में 90–95% ई-अपशिष्ट अनौपचारिक क्षेत्र द्वारा अम्लीय लीचिंग और खुले में जलाने जैसी असुरक्षित विधियों से संसाधित किया जाता है।
  • अपर्याप्त अवसंरचना: अधिकृत संग्रह केंद्रों और पुनर्चक्रण इकाइयों की कमी, कमजोर लॉजिस्टिक्स एवं रिवर्स सप्लाई चेन।
  • कमज़ोर निगरानी: उत्पन्न मात्रा और पुनर्चक्रण दरों पर विश्वसनीय आँकड़ों की कमी, जिससे अनौपचारिक चैनलों में रिसाव होता है।

भारत में ई-अपशिष्ट प्रबंधन हेतु पहल

  • विस्तारित उत्पादक उत्तरदायित्व (EPR): उत्पादकों, आयातकों और ब्रांड मालिकों को उनके उत्पादों के जीवन-चक्र के अंत में उत्पन्न अपशिष्ट के प्रबंधन की जिम्मेदारी दी गई है।
    • ऑनलाइन EPR पोर्टल: केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा विकसित, जहाँ उत्पादक, निर्माता, पुनर्चक्रणकर्ता और पुनर्नवीनीकरणकर्ता पंजीकृत होते हैं।
  • ई-अपशिष्ट (प्रबंधन) नियम, 2022: पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 2016 के नियमों का व्यापक संशोधन कर अधिसूचित।
  • भारत का प्रथम ई-अपशिष्ट क्लिनिक: भोपाल, मध्य प्रदेश में स्थापित, जहाँ घरेलू और वाणिज्यिक इकाइयों से ई-अपशिष्ट का पृथक्करण, प्रसंस्करण एवं निपटान किया जाता है।
  • पैन-इंडिया ई-अपशिष्ट पुनर्चक्रण अभियान: खनन मंत्रालय द्वारा 2025 में विशेष अभियान 5.0 के अंतर्गत शुरू, जिसका उद्देश्य सरकारी कार्यालयों में स्वच्छता और वैज्ञानिक निपटान सुनिश्चित करना है।

बेसल कन्वेंशन

  • बेसल कन्वेंशन एक वैश्विक संधि है जिसका उद्देश्य खतरनाक अपशिष्ट के सीमापार आवागमन और उसके निपटान को नियंत्रित करना है, ताकि ऐसे अपशिष्ट का प्रबंधन पर्यावरणीय दृष्टि से सुरक्षित तरीके से किया जा सके।
  • यह संधि निम्नलिखित प्रावधान करती है:
    • आयातक देशों की पूर्व-सूचित सहमति।
    • खतरनाक अपशिष्ट का पर्यावरणीय रूप से सुरक्षित प्रबंधन।
    • अवैध अपशिष्ट शिपमेंट को निर्यातक के व्यय पर वापस भेजना।
  • यह संधि 1989 में अपनाई गई और 1992 में लागू हुई।
  • भारत इस संधि का पक्षकार है।

आगे की राह

  • देशों को अपने घरेलू पुनर्चक्रण अवसंरचना को सुदृढ़ करना चाहिए ताकि वे अपने अपशिष्ट का प्रबंधन स्वयं कर सकें।
  • बेसल कन्वेंशन का सख्ती से पालन और खतरनाक अपशिष्ट की शिपमेंट के लिए वैश्विक ट्रैकिंग प्रणाली आवश्यक है।
  • सर्कुलर/चक्रीय अर्थव्यवस्था (Circular Economy) को बढ़ावा देना चाहिए।
  • विकसित देशों को अपने अपशिष्ट की पूरी जिम्मेदारी लेनी चाहिए और सतत एवं नैतिक पर्यावरणीय शासन सुनिश्चित करना चाहिए।

स्रोत: TOI

 

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